*आरम्भ * - साहित्यवाले.कॉम

*आरम्भ *

कवि: निभा झा


हम हैं साहित्य वाले, हम हैं साहित्य वाले कलम ने खुद से संवाद किया, एक नई यात्रा का प्रण लिया। यह आरम्भ है अभिव्यक्ति का, रचना में स्पर्श होगा सृजन शक्ति का। शब्दों ने ली है पहली साँस, भावों में घुली मधुर प्यास। मौन भी अब स्वर बन पाएगा, साहित्य की अलख जगाएगा। अनुभव से बुनेंगे शब्दों का हार, प्रेरणा बनेगी हर एक विचार। ये मंच नहीं, एक साधना है, जहां हर रचना आत्मवंदना है। लेखनी अब केवल लेखनी नहीं रही, वो आत्मा की पुकार बन गई कहीं। साहित्य वाले हैं भावों के संग.., जहां हर हृदय है एक अनुपम रंग।
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रचना के बारे में

संदर्भ: कवि यहां सीधे आत्मा की पुकार को कविता में ढालने का आग्रही है .. श्रेणी: कविता संग्रह उपश्रेणी: प्रेरणादायक

कीवर्ड्स (Keywords)

भावउम्मीदgeetemotionssmilesसाधनाआत्मा

प्रश्न और उत्तर

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Q1 : कवि के अनुसार अब लेखनी क्या बन गई है ?
A1 : कवि के मुताबिक, लेखनी अब सिर्फ लेखनी नहीं रही, अपितु आत्मा की पुकार बन चुकी है !

टिप्पणियाँ (Comments)


2 टिप्पणियाँ

अज्ञात August 30, 2025, 2:49 am

बहुत सुंदर कविता 👏👏👏

डॉ झा August 29, 2025, 6:40 pm

बहुत अच्छा