तो कर न सकेगा… कर न सकेगा
कवि: डॉ पी के झा
तू चाहेगा करना दुराचार,
मगर जब राम की आत्मा जगेगी अंदर,
तो कर न सकेगा… कर न सकेगा।
तू चाहेगा छल से किसी को हराना,
मगर जब कृष्ण की मुरली बजेगी अंदर,
तो कर न सकेगा… कर न सकेगा।
तू चाहेगा अभिमान में डूबना,
मगर जब भीष्म की प्रतिज्ञा गूंजेगी अंदर,
तो कर न सकेगा… कर न सकेगा।
तू चाहेगा नारी को नीचा दिखाना,
मगर जब सीता की मर्यादा बोलेगी अंदर,
तो कर न सकेगा… कर न सकेगा।
तू चाहेगा माँ-बाप को अपमानित करना,
मगर जब श्रवण कुमार की छवि चमकेगी अंदर,
तो कर न सकेगा… कर न सकेगा।
तू चाहेगा देश से मुँह मोड़ लेना,
मगर जब नेताजी का जयघोष गूंजेगा,
तो कर न सकेगा… कर न सकेगा।
तू चाहेगा संतों की वाणी दबाना,
मगर जब तुलसी–कबीर की आवाज़ उठेगी,
तो कर न सकेगा… कर न सकेगा।
तू चाहेगा आलस्य में जीना,
मगर जब विवेकानंद की ज्वाला जलेगी,
तो कर न सकेगा… कर न सकेगा।
तू चाहेगा विनाश करना,
मगर जब शिव का तांडव और गंगा का प्रवाह उठेगा,
तो कर न सकेगा… कर न सकेगा।
तू चाहेगा चालाकी से राज करना,
मगर जब चाणक्य की नीति जग जाएगी,
तो कर न सकेगा… कर न सकेगा।
तू चाहेगा निर्दोषों को सताना,
मगर जब अशोक की करुणा उमड़ेगी,
तो कर न सकेगा… कर न सकेगा।
तू चाहेगा मोह में फँस जाना,
मगर जब अर्जुन के प्रश्नों पर गीता बजेगी,
तो कर न सकेगा… कर न सकेगा।
रचना के बारे में
श्रेणी: कविता संग्रह
उपश्रेणी: प्रेरणादायकउपश्रेणी: सामाजिकउपश्रेणी: प्रेम
बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति!
निराशा से जीवन की ओर प्रेरित करती कविता
शुभकामनायें 💐💐
अध्यात्म के मार्ग से चलकर जनमानस तक पहुँचने वाली कविता 👏👏👏रचनाकार को बधाई 💐