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स्त्री मन

कवि: विनीता पुष्पम


क्यूँ हृदय की पीड़ा अकुलाती है बाहर आने को क्यूँ नहीं मन रमता है अपने ही अंदर! आख़िर वर्षों से तो स्त्रियों ने संदूक की निचली तह में रखी उस गुलाबी चिट्ठी की तरह सहेज और छुपा कर रखती आई ख़ुद को! घूंघट के नीचे सिसकते मन को छुपाकर बेमन से ही सही जी तो रही है! फ़िर क्यूँ मेरा मन खुली हवा में साँस लेने को और मुस्कुराहट के साथ स्वच्छन्द जीना चाहता है! तो क्या मैं बगावती हूं? या फ़िर वर्षों से बनी बनाई रूढ़ियों को तोड़ देना चाहती हूं! हाँ... मैं तोड़ देना चाहती हूं वो सारो वर्जनाएँ..... जो इंसान को दो खेमे में बाँटती हो! किसी के लिए खुला आसमान, और किसी के लिए..... घूँघट से झाँकती आँखें!
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रचना के बारे में

संदर्भ: ये कविता खासकर घर की चाहरदिवारी में रहनेवाली स्त्रियों की मनोदशा को लेकर लिखी गई है । श्रेणी: कविता संग्रह उपश्रेणी: सामाजिक

कीवर्ड्स (Keywords)

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प्रश्न और उत्तर

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Q1: यह कविता स्त्रियों को क्या संदेश देता है ?
A1: ये कविता स्त्रियों को सदियों पुरानी वर्जनाएं तोड़कर बराबरी का समाज बनाने को प्रेरित करती है

टिप्पणियाँ (Comments)


1 टिप्पणियाँ

अज्ञात September 15, 2025, 3:57 am

उम्दा रचना 👌👌