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तेरा वज़ूद

कवि: निभा झा


कैसे बताऊँ कि तुम मेरे लिए क्या हो... कैसे बताऊँ कि तुम मेरे लिए क्या हो... तुम स्पर्श, तुम श्वास, तुम ही प्रकाश, तुम ही धूप-छाँव, तुम बूँद, तुमसे ही श्वास। तुम ही सरगम, तुम ही मलकौंस। कैसे बताऊँ कि तुम मेरे लिए क्या हो... सप्तक भी तुम, नाद भी तुम, तुमसे ही सा-रे-गा-मा, तुमसे ही है मधुर संगीत। तुम ही ताल की थिरकन, तुम ही भाव की कंपन, तुम ही धुन हो, तुम ही से है धड़कन। कैसे बताऊँ कि तुम मेरे लिए क्या हो... मेरे लिए स्वर भी तुम, साज भी तुम, गीत भी तुम, प्रीत भी तुम, सुर भी तुम, तुमसे ही दिन-रैन, तुम ही कजरारे नैन। तुम ही अर्पण, तुम ही समर्पण, तुम ही राग, तुमसे ही सुहाग। कैसे बताऊँ कि तुम मेरे लिए क्या हो... मेरे लिए बागेश्री भी तुम, तोड़ी भी तुम, तुमसे ही आलाप और छंद भी तुम, तुम ही मल्हार हो, तुम ही भीमपलासी, तुम ही जीवन के सुर-ताल की परछाईं। कैसे बताऊँ कि तुम मेरे लिए क्या हो... तुम ही अनुनय, तुम ही विनय, मेरे लिए तुम प्रणय की मधुर तरंग हो। तुम ही मंदिर, तुम ही पूजा हो, दिल में तेरे सिवा न कोई दूजा हो। कैसे बताऊँ कि तुम मेरे लिए क्या हो... मेरे लिए तुम विश्वास का अक्षर हो, तुम ही जीवन का शाश्वत शिखर हो। कैसे बताऊँ कि तुम मेरे लिए क्या हो... कैसे बताऊँ कि तुम मेरे लिए क्या हो...
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रचना के बारे में

श्रेणी: कविता संग्रह उपश्रेणी: प्रेम

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