शिव -शक्ति
कवि: निभा झा
तुम हो शिव —
अचल, निस्तब्ध गहराई।
मैं हूँ शक्ति —
जीवन की तरंगाई।
तुम ध्यान —
मौन समाधि का विचार।
मैं चपल, चंचल —
फूलों की गंध, पवन का संचार।
तुम विरक्ति —
शिखर हिमगिरि की गहन शांति।
मैं अनुरक्ति —
पंखुरी से झरती मधुर कांति।
तुम शून्य —
निर्मल गगन में मौन प्रवाह।
मैं पूर्ण —
सृष्टि में आत्मा का निर्वाह।
तुम पुरुष —
अमिट आत्मा की गंभीरता।
मैं प्रकृति —
हरियाली, कली, नदी की चंचलता।
तुम मौन —
विरक्त सन्यासी का श्वास।
मैं स्वर —
वीणा की झंकार, जग का प्रकाश।
दोनों मिलकर —
सृष्टि का रहस्य रचते हैं।
तुम शिव, मैं शक्ति —
और इसी से जग हँसते हैं।
रचना के बारे में
श्रेणी: कविता संग्रह
उपश्रेणी: प्रेम
अभी तक कोई टिप्पणी नहीं है।