शिव -शक्ति - साहित्यवाले.कॉम

शिव -शक्ति

कवि: निभा झा


तुम हो शिव — अचल, निस्तब्ध गहराई। मैं हूँ शक्ति — जीवन की तरंगाई। तुम ध्यान — मौन समाधि का विचार। मैं चपल, चंचल — फूलों की गंध, पवन का संचार। तुम विरक्ति — शिखर हिमगिरि की गहन शांति। मैं अनुरक्ति — पंखुरी से झरती मधुर कांति। तुम शून्य — निर्मल गगन में मौन प्रवाह। मैं पूर्ण — सृष्टि में आत्मा का निर्वाह। तुम पुरुष — अमिट आत्मा की गंभीरता। मैं प्रकृति — हरियाली, कली, नदी की चंचलता। तुम मौन — विरक्त सन्यासी का श्वास। मैं स्वर — वीणा की झंकार, जग का प्रकाश। दोनों मिलकर — सृष्टि का रहस्य रचते हैं। तुम शिव, मैं शक्ति — और इसी से जग हँसते हैं।
17 बार देखा गया

साझा करें:

रचना के बारे में

श्रेणी: कविता संग्रह उपश्रेणी: प्रेम

टिप्पणियाँ (Comments)


0 टिप्पणियाँ

अभी तक कोई टिप्पणी नहीं है।