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स्त्री

कवि: अनीता सिंह


मैं तुम्हारी बंदिनी नहीं बल्कि वह हूँ, जो झुकती है, ताकि तुम्हारे दर्प का प्रासाद गगन को छू सके_ मेरे दृग के कारागृह से बहते आसूँओं की बूँदे तुम्हारी विजय की वीणा पर, हर्ष के तान बनकर गूँजते हैं _ मैं व्यवस्थित हूँ, तभी तो तुम्हारे जीवन की विसंगतियाँ,नियम और अनुशासन के बंधन में, सुरक्षित रहती हैं_ मेरी मर्यादाओं का अंकन, तुम्हारे उन्मुक्त अट्टहास की सीमाएँ हैं_ मैं पुरुष भी हो सकती थी, लेकिन मैं नारी ही रही, क्योंकि मेरे बिना, तुम्हारे पुरुषत्व का आधार भी, नष्ट हो जाता_ मेरी ही विनम्रता में, तुम्हारे पौरुष का पोषण है, मैं व्यर्थ नहीं, मेरे बिना, तुम्हारी पहचान का भी कोई अर्थ नहीं _!!
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श्रेणी: कविता संग्रह उपश्रेणी: सामाजिक

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स्त्रीबंदिनीपौरुषपहचानअर्थ.

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