एक अभिशप्त रेल यात्रा - साहित्यवाले.कॉम

एक अभिशप्त रेल यात्रा

कवि: अरविन्द पाण्डेय


वर्ष 1984, जुलाई का महीना, किताबों से भरा बक्सा माथा पर रखकर खेतों की पतली पगडंडियों पर संतुलन बनाकर चलते हुए अपने गांव से कोई डेढ़ कोस दूर काशीचक रेलवे स्टेशन पहुंचा था अपने कॉलेज जाने के लिए. बहुत खुश था मैं. आई.एससी. (इंटरमीडिएट ऑफ साइन्स) का परीक्षा परिणाम अपेक्षित जो रहा था. मैं अपने गांव का पहिला विद्यार्थी था, जो प्रथम श्रेणी से उक्त परीक्षा में उत्तीर्ण हुआ था. पसीने से नहा ही गया था रेलवे स्टेशन आते आते. स्टेशन आने के बाद पता चला कि ट्रेन विलंब से आयेगी. टिकट खिड़की पर जाकर टिकट खरीदा और अपने सामान के पास पहुंचा ही था कि वहां मेरी मुलाकात एक ऐसे सज्जन से हो गयी, जो कभी अपने गांव के मिडिल स्कूल में मुझसे एक कक्षा उपर में पढ़ा करते थे. गांव में घर पर उभरी परिस्थितियों के कारण उन दिनों वे खेती करके अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति करते थे और भांग-गांज़ा पीना उनका शौक बन गया था. मेरे हाथ में टिकट देखकर उन्होंने मुझसे कहा कि टिकट क्यों लिया? टिकट के पैसे से मिठाई खरीदकर हमें खिला देते तो कितना अच्छा होता. मेरे लिए यह एक अप्रत्याशित प्रश्न था. मैंने उनसे कहा जब हम ट्रेन से यात्रा करते हैं तो हमारी जिम्मेवारी बनती है कि हम उचित टिकट लेकर ही यात्रा करें. आपको मिठाई खिलाना और यात्रा के लिए टिकट लेना, दो अलग-अलग बातें हैं. हम दोनों को एक साथ नहीं जोड़ते. इसपर उन्होंने मुझसे कहा कि आप बहुत ही सिद्धांत बघारते हैं, ऐसे सिद्धांत बघारने वाले बहुत देखे. जो लोग सिद्धांत बघारते हैं और व्यवहारिक होकर चीजों को नहीं देखते, वे जीवन में कभी सफल नहीं होते. मैं चुपचाप उन्हें सुन रहा था और उनकी ओर टुकुर-टुकुर देख रहा था. वे बोले जा रहे थे और बोलते-बोलते उनकी मुँह से यह निकल गया कि आप भी अपने जीवन में कुछ नहीं कर पायेंगे, सफल नहीं हो पायेंगे. मेरी बात याद रखियेगा. एक छोटी सी बात पर कोई व्यक्ति किसी के लिए क्या बोल देगा और उसके मुँह से निकली किस बात का क्या असर किस पर पड़ेगा, इसके बारे में लोग विचार भी नहीं करते. खैर! ट्रेन अब आ गयी थी और मैं उस भीड़-भाड़ वाली ट्रेन में किसी प्रकार चढ़ गया था. लेकिन अब मैं अभिशप्त हो गया था. आज तक किसी ने मेरे सामने मेरे लिए कोई ऋणात्मक बातें नहीं की थी. लेकिन आज अपने ही गांव के एक व्यक्ति की बातों से, उनकी सोच से आहत था, दुखी था. काफी भारी मन से यात्रा कर रहा था. शेखपुरा तक पहुंचते-पहुंचते बैठने की जगह मिल गयी. किन्तु खुशी की जगह एक आशंका ने अपना घर बसा लिया था मेरे मन के किसी कोने में. यात्रा का आनन्द समाप्त हो गया था. उन दिनों सिर्फ पैसेंजर ट्रेन ही चला करती थी "गया से भागलपुर" के बीच. और हम सभी को भी इस बात की कदापि चिंता नहीं रहती थी कि ट्रेन कब पहुंचेगी भागलपुर. कभी मूंगफली वाला आता था तो कभी झाल-मुढ़ी बेचने वाला. 50 पैसे में कभी मूंगफली ले लिया तो कभी झाल-मुढ़ी. पानी पीने के लिए न कोई प्लास्टिक की बोतल होती थी और न ही कोई कोल्ड ड्रिंक . हाँ गरमा-गरम चाय अवश्य मिल जाया करती थी डिब्बे में ही. ट्रेन में भीड़ चाहे कितनी ही क्यों न हो, इन चाय बेचने वालों को रास्ता मिल ही जाता था. देर शाम तक हम भागलपुर पहुंच गये. स्टेशन से रिक्शा लेकर हम परबत्ती पहुंचे और धोबिया काली स्थान के पास बने किशुन साह लौज में किसी प्रकार एक कमरा मिला. किराया 75 रुपये था. बहुत होता था 75 रुपये किराया उन दिनों. नया-नया बना था वह लौज. कमरा बहुत छोटा था, फर्श कच्चा, शौचालय की व्यवस्था नहीं, खुले में जाना पड़ता था. कभी रेलवे लाइन के पास आम के बगीचे में तो कभी रात्रि के समय संस्कृत महाविद्यालय के निकट के खुले मैदान में. परेशानी तो तब होती थी जब तबियत खराब हो जाती थी... और ऐसे में शौच के लिए बाहर जाना होता था. कॉलेज हॉस्टेल से बाहर बहुत ही कष्टकर जीवन था. खाना स्वयं बनाते थे. खाना बनाने के लिए किरासन तेल का स्टोव हुआ करता था और तेल लेने के लिए भी संघर्ष करना पड़ता था. कमरे में 60 वॉट का एक बल्ब लगाते थे, और बिजली नहीं होने की स्थिति में किरासन तेल से जलने वाले लैम्प से रोशनी करते थे. हाँ एक टॉर्च अवश्य रखते थे. मज़े की बात यह थी कि जिस बगीचे में हम शौच के लिए जाया करते थे, वहां दो-चार दिनों में एक आध लाश के दर्शन अवश्य हो जाया करते थे. और हम सभी फिर उस लाश से जुड़ी संभावित कड़ियों का पोस्टमार्टम किया करते थे. यह बात और है कि हमें कभी भय नहीं लगा. आज, जब कभी अपने जीवन में कोई असफलता हाथ लगती है या यूँ कहें जिंदगी के जिस भी मोड़ पर जब कभी असफलता हाथ लगी या फिर बहुत नज़दीक आकर भी मंज़िल आँखों से ओझल हो गयी, तब उस अभिशप्त रेल यात्रा की याद अवश्य आ जाती है. लेकिन उसी के साथ यह भी विचार में आता है कि जिस देश में हमारे उक्त ग्रामीण की मानसिकता वाले लोग रहते हों, वहां की रेल व्यवस्था कभी दुरुस्त हो सकती है क्या. जहां इस मानसिकता वाले लोग रहते हों कि "सरकारी संपत्ति आपकी अपनी संपत्ति है" और इसीलिए रेल के डिब्बे से उखाड़कर, निकालकर ले जाने वाली वस्तुओं को अधिकारपूर्वक घर ले जाते हुए गर्वोन्मत्त हो अपनी शेखी बघारते हों, उस देश में कभी कोई सरकारी व्यवस्था दुरुस्त हो सकती है क्या? जिन लोगों को इस प्रकार का कभी साक्षात अनुभव नहीं हुआ है वे कृपया दिल्ली या पटना से किसी भी दिशा में जाने वाली ऐसी रेल गाड़ियों में यात्रा करें जो आस पास के छोटे स्टेशनों पर रुकती हो, आपको कई प्रकार के सुखद अनुभव होंगे, जिसे आप कभी नहीं भुला पायेंगे. आप सभी की जीवन यात्रा सुखमय हो. मैं तो किसी भी प्रकार का अपराध किये बगैर भी उस अभिशप्त यात्रा का बोझ ढो रहा हूँ. #संस्मरण #साहित्यवाले #हिंदीसाहित्य #रेलयात्रा #sahityawale_com
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श्रेणी: ब्लॉग और लेख उपश्रेणी: संस्मरण

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