युवा मन के अंकुर... - साहित्यवाले.कॉम

युवा मन के अंकुर...

कवि: देवाशीष


है अंधेरा गज़ब.. राह दिखती नहीं डर के ये दो कदम रुक न जाएं कहीं.. जिंदगी है सफ़र.. जानता मैं भी हूं चलके मंज़िल मिलेगी.. भरोसा नहीं लाख अरमान कुचले गए हों यहां.. कैसे शिकवा करूं, है ये अपनी जमीं आज हंस लो हमारी हस्ती पे यारों.. वक्त बदलेगा इक दिन, है इतना यकीं अब भी शामिल हूं मैं.. दौड़ में ज़िंदगी की बेशक खामोश हूँ.. अभी हारा नहीं बस थोड़ी सी मोहलत हमें और दे दो अपनी पहचान होगी .. यहीं पर कहीं
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रचना के बारे में

संदर्भ: ये कविता ३५ वर्ष पहले लिखी गई थी जब एक खास वर्ग के लिए अचानक आरक्षण का प्रावधान कर दिया गया था और इससे अन्य वर्गों के युवा उपेक्षित और उद्वेलित महसूस कर रहे थे.. मानो किसी ने उनके सपनों में सेंध लगा दी हो.. ! श्रेणी: कविता संग्रह उपश्रेणी: सामाजिक

कीवर्ड्स (Keywords)

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प्रश्न और उत्तर

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Q1 : ये कविता युवा मन को क्या संदेश देना चाहती है?
A1 : ये कविता युवा मन को विपरीत परिस्थितियों में भी बिना विचलित हुए अपने प्रयासों को जारी रखने का संदेश देती है । यही सफलता का मार्ग है ।

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