रुकने का अब समय नहीं है ...
कवि: देवाशीष
आओ हर क्रंदन से कह दें ..
रोने का अब समय नहीं है ।
आओ हर अड़चन से कह दें ..
तुझसे डरने की वज़ह नहीं है ।
जग के अभिनंदन से कह दें..
अवलोकन का समय नहीं है ।
मां की आशंकाओं से कह दें..
लाल तुम्हारा.. थका नहीं है ।
सावन की बूंदों से कह दें ..
सजनी का धीरज चुका नहीं है ।
बच्चों की किलकारी से कह दें ..
गूंजों पे तुम्हारी.. रोक नहीं है ।
युवा हमारा जाग उठा है..
नव भाग्योदय का समय यही है ।।
रचना के बारे में
संदर्भ: साहित्य को सृजन से लेकर समाज के नव भाग्योदय में अब एक अग्रणी भूमिका निभानी होगी, युवा ऊर्जा को सही राह दिखानी होगी.
आइए मिलकर प्रगति पथ को ओर बढ़ें...
श्रेणी: कविता संग्रह
उपश्रेणी: प्रेरणादायक
कीवर्ड्स (Keywords)
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प्रश्न और उत्तर
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Q1 : भारत का भविष्य कवि को कैसा दीखता है ? A1 : भारत में नव चेतना आ चुकी है, युवा अब अपने लक्ष्यों को लेकर आशान्वित है, साहित्यकारों, अभिभावकों को भी अपनी भूमिका निभानी है, पर भविष्य उज्जवल है।
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