कान्हा की बंसी मैं ... - साहित्यवाले.कॉम

कान्हा की बंसी मैं ...

कवि: देवाशीष


मैं भावों का रफ़ूगर हूं .. उम्मीद बंधाता हूँ.. गिरती हुई पलकों को .. गीतों से उठाता हूं थकते हुए जज़्बों को .. झूलों पे ले जाता हूं । बच्चों से जो कोमल हों उन्हें लोरी मैं सुनाता हूं .. बरछी से जो तीखे हों .. उन्हें तांडव भी दिखाता हूं इक भोर नवेली सी .. रातों से चुराता हूं । झुकते हुए कंधों को .. सीधा तनवाता हूं तनती हुई भृकुटी को हंसना मैं सिखाता हूं.. शब्दों के समंदर से.. कुछ मोती लुटाता हूं । जिन तक हो पहुंच मेरी.. उनकी टीसें मैं चुराता हूं हो दिल में कसक जिसकी.. वहीं गुजरा हुआ नाता हूं कान्हा की मैं बंसी हूं.. जग की आस बंधाता हूं ।।
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रचना के बारे में

संदर्भ: Poems emphasizes on helping others and spreading smiles... श्रेणी: कविता संग्रह उपश्रेणी: सामाजिक

कीवर्ड्स (Keywords)

भावउम्मीदgeetकान्हाkanhaआसemotionssmiles

प्रश्न और उत्तर

Failed to parse questions and answers. Here is the raw content:

Q1 : Yeh Kavita kya sandesh deti hai ?
A1 : Yeh kavita hamen apme aas pas sabki madad karne aur muskanen bantne ki baat karti hai ..

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