राजर्षि अरुण

राजर्षि अरुण

साहित्य-साधना --- रुचि भी, सरोकार भी

पूर्ण जीवनी

02 दिसंबर 1969 को बिहार में मधेपुरा जिले के शाहपुर गाँव में जन्मे राजर्षि अरुण ने टी एन बी कॉलेज, भागलपुर से संस्कृत प्रतिष्ठा में स्नातक करने के बाद दिल्ली विश्वविद्यालय में भी संस्कृत से स्नातकोत्तर की पढ़ाई जारी रखी पर कुछ समय बाद सब छोड़कर केन्द्रीय शिक्षण संस्थान, दिल्ली विश्वविद्यालय से शिक्षा-स्नातक करने चले गए। बाद में उन्होंने देवी अहिल्या विश्वविद्यालय से हिन्दी और अंग्रेजी में स्नातकोत्तर किया। साथ ही, डॉ. हरि सिंह गौड़ विश्वविद्यालय से मनोवैज्ञानिक परामर्शन में स्नातकोत्तर डिप्लोमा किया। उसके बाद एच आर और मार्केटिंग में सिक्किम मणिपाल विश्वविद्यालय से एम बी ए की उपाधि ली। आजकल ग्राफिक एरा विश्वविद्यालय, देहरादून से प्रबंधन अध्ययन में पी एच डी कर रहे हैं।

वर्तमान में उत्तराखंड में श्रीनगर जल विद्युत परियोजना के महाप्रबंधक के रूप में कार्यरत राजर्षि ने अपने व्यावसायिक जीवन की शुरुआत इंदौर के प्रसिद्ध डेली कॉलेज में एक शिक्षक से रूप में की। लगभग 13 वर्षों तक एक प्रयोगधर्मी शिक्षक के रूप में विभिन्न स्थलों पर भाषा-शिक्षण (संस्कृत/हिन्दी/अंग्रेजी) का कार्य करते रहे। इस दौरान बड़े स्तर पर शिक्षक-प्रशिक्षण का कार्य करने के साथ-साथ उन्होंने प्राचार्य के पद पर भी अपनी सेवाएं दीं। बाद के समय में उन्होंने अपना सेवा-क्षेत्र परिवर्तित कर लिया और कॉर्पोरेट जगत का हिस्सा बन गए। विभिन्न जल विद्युत परियोजनाओं में कार्य करते हुए उन्हें मध्य प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, सिक्किम, जम्मू-कश्मीर और उत्तराखंड की वादियों तथा वहाँ के आम लोगों के जीवन को नजदीकी से देखने-समझने-महसूसने का अवसर मिला। इसका प्रभाव उनकी रचनाओं में बहुत स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है।

कॉलेज के समय से ही साहित्यिक रचनाएं करने वाले राजर्षि अरुण की कई साहित्यिक उपलब्धियां हैं। वे देश भर के पत्र-पत्रिकाओं में लगातार छपते रहे हैं जिनमें राजभाषा पत्रिका, संवदिया, ककसाड़, साहित्यनामा, साहित्य प्रभा, गुलमोहर, गूँज, नया, लोकमत समाचार, सृजनोन्मुख, मुहिम, तर्पण, शब्द-सागर, क्षितिज के पार, कविता कोश, अभिव्यक्ति, भास्कर, नई दुनिया, अमर उजाला आदि प्रमुख हैं। वेब पत्रिकाओं में भी उनकी रचनाएं बराबर अपना स्थान बनाती रही हैं। राजर्षि मुख्य रूप से एक कवि हैं पर कहानी, व्यंग्य आलेख और समीक्षा लेख आदि भी लगातार लिखते रहे हैं। अब तक उनके 9 काव्य-संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं : क्योंकि उसे भी अर्थ चाहिए (2008), यात्रा-विमर्श (2017), ये भी कोई कविता है (2018), आग लगने से बुझने के बीच (2018), मैं फिर आऊँगा (2020), कुछ तो सोचते होंगे वे लोग (2020), चाँद, नदी और स्त्री (2022), धूप के उजाले में (2022) और फूल खिलने से नहीं चूकेगा (2025)। इसके अलावा उनकी प्रेम कविताओं का एक संकलन अभी प्रकाशनाधीन है। कुछ समय के लिए वरिष्ठ साहित्यकार स्व. डॉ. मधुकर गंगाधर के प्रधान संपादकत्व में छपने वाली हिन्दी त्रैमासिक पत्रिका ‘नया’ के संपादक परिवार का हिस्सा भी रहे।

देवी अहिल्या बाई होल्कर की नगरी इंदौर को अपना बसेरा बना लेने वाले अरुण से उनके मोबाईल नंबर 9520973702 / 9906045787 या ईमेल आई डी - rajarshiarun@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।