डॉ पी के झा
एक न्यूरोसर्जन जो गलत सोच को निकाले..
पूर्ण जीवनी
पेशे से एक न्यूरोसर्जन हूँ. न्यूरो केयर इंडिया डॉट इन, नॉएडा, का डायरेक्टर हूँ.. 25 साल पहले AIIMS, N.Delhi से न्यूरोसर्जरी में डिग्री लेने के बाद, ब्रेन और स्पाइन का ऑपरेशन कर रहा हूँ.. लेकिन एक बात में कहना चाहता हूँ,
कोई पद, कोई डिग्री, कोई कार्यक्षेत्र — किसी व्यक्ति को परिभाषित नहीं करता।
तो जब कोई कहता है, एक न्यूरोसर्जन कविता क्यों लिख रहा है?
तो मेरा उत्तर बस इतना है —क्योंकि मैंने आत्मा की चीख को सुना है।
हर लकवा, हर मिरगी, हर अनिद्रा, हर बेचैनी —शरीर नहीं, आत्मा की पुकार है।
मगर आधुनिक चिकित्सा ने इस पुकार को केमिकल्स और सर्जरी से चुप कराना सीख लिया है।
दर्द को समझने की बजाय दबा दिया, बीमारी को मिटाने की बजाय मुनाफा बना दिया।
डॉक्टर शब्द लैटिन docere से निकला है — जिसका अर्थ है: सिखाने वाला
न कि सिर्फ इलाज करने वाला।
और आज शिक्षा नहीं, नौकरी के लिए लोग पढ़ रहे है।
सेवा नहीं, सिस्टम बन गया है। संवेदना नहीं, सिर्फ डिग्री लेने की होड़।
लेकिन अब वो समय आ गया है — जब कलम उठानी पड़ी।
सर्जरी से नहीं, संवेदना से इलाज करना होगा।
हर कविता, एक चीख है — हर पंक्ति, एक दवा। हर आवाज़, एक आह्वान।
सहित्यवाले की रचनाएं सिर्फ एक लेखनी नहीं, ये एक यज्ञ है — एक चिंगारी है।
जिससे फिर से उस भारत को जगाना है — जिसमें हर पुरुष में राम हों, हर नारी में सीता।
वरना ये मौन अब टिकेगा नहीं — शिव का रौद्र जाग चुका है।
या तो जगेगा भारत —या फिर स्वयं सृष्टि करेगी संहार।
सहित्यवाले के हर कवि, देवताओं के दूत हैं —कभी राम, कभी कृष्ण, कभी चाणक्य, कभी दुर्गा।
ये आपको उठाने आए हैं —स्मरण दिलाने कि आप कौन हैं।
जैसा कि ऐतरेय ब्राह्मण कहता है —
कलि शयानो भवति – जो सोया है, वह कलयुग है।
संजनाहस्ति द्वापरः– जो बैठा, वह द्वापर है।
उत्तिष्ठत त्रेता भवति – जो खड़ा हो गया, वह त्रेता है।
कृतं पद्यते चरण – और जो चल पड़ा, वह सतयुग है।
तो अब उठो —
भारत को फिर से सतयुग की ओर ले चलो।
एक ऐसा भारत — जो फिर से विश्वगुरु बने।
जहाँ कविता सिर्फ शब्द नहीं, क्रांति का बीज बने।
माँ कवियित्री थीं.. उनका ही खून अब मेरे अन्दर भी उबल रहा है, इन रचनाओं के रूप में.. मेरी रचनाएँ हर उम्र के लोगों के लिए है, बच्चे, युवा, नारी, बूढ़े. चाहत यही कि इन कविताओं की गूँज हर गाँव गली व शहर में उठे.. स्कूलों में इनका पाठ हो और ये मानव जागरण बन जाए.. लोग सोच बदलेंगे, तभी दिशा बदलेगी और फिर इस देश की दशा बदलेगी..
तो आइये, सहित्यवाले की रचनाओं को सुने, सुनाएं, गुनगुनाएं और इनका सामूहिक पाठ कर फिर से देश की चेतना बदलें..